शुभ्रांशु चौधरी
23 मार्च 2024 को दिल्ली में बस्तर में हो रही हिंसा पर एक बैठक हुई थी.इसमें छत्तीसगढ़ से आए मूलवासी बचाओ मंच के दो नेताओं ने भी भाषण दिया था. उसके बाद मैंने उनमें से एक नेता से बात की पर उसको कहीं छपने नहीं भेजा. आज भी उस नेता का नाम सार्वजनिक नहीं कर रहा.नक्सली अब खत्म जरूर हो गए हैं पर खतरा लेना ठीक नहीं. पर इस तरह की खबरें अब धीरे-धीरे बाहर आनी चाहिए.
सवाल: आज आपने बहुत अच्छा भाषण दिया. आपके वापस जाने की फ़्लाइट कब है?
जवाब: कल सुबह 6 बजे
सवाल: तब तो आपको 4 बजे सुबह निकलना होगा क्या आयोजकों को टैक्सी आदि के लिए बोल दिया? कौन से टर्मिनल से है फ़्लाइट?
जवाब: जी भैया लोगों को टैक्सी के लिए बोला है. ये टिकट देखकर प्लीज़ बताइए कौन सा टर्मिनल है
सवाल: टर्मिनल 2 है इंडिगो. उस समय मेट्रो नहीं चलती तो आपको टैक्सी से ही जाना होगा. ये टिकट का पैसा कौन दिया?
जवाब: पार्टी के शंकर दादा देते हैं
सवाल: शंकर दादा आदिवासी हैं या तेलुगु?
जवाब: स्थानीय नेता अधिक नहीं है भैया ज्यादातर बाहरी हैं
सवाल: मुझे तो लग रहा था कि नीचे के लेवल में अब स्थानीय लोग भी नेता बने हैं
जवाब: हमारे इलाक़े में तो बाहरी लोग ही सब कुछ हैं
(टिप्पणी: आदिवासी अक्सर ट्रेन से चलते हैं पर मैंने यह सवालश्न पूछकर अंधेरे में तीर मारा था जो सही निशाने पर बैठ गया. उस बैठक में भी यह सवाल किया गया कि मूलवासी बचाओ मंच एक स्वतःस्फूर्त आदिवासी आंदोलन है जिसका माओवादियों से कोई लेना देना नहीं है.)
सवाल: आपका आज का भाषण बहुत अच्छा था पर आप लोग यहां सैन्यीकरण का विरोध करने आए हो. भाई बस्तर में तो पहले पुलिस थाना भी नहीं था सैकड़ों किलोमीटर तक. बस्तर का सैन्यीकरण पहले किसने किया? 80 के दशक में कुछ लोग बंदूक़ लेकर यहां छुपने आए आप लोगों ने तो उनको बुलाया नहीं था. अब उनको भगाने के लिए सरकार कैम्प लगा रही है तो आप लोग उसका विरोध कर रहे हो. क्या आप माओवादी सैन्यीकरण चाहते हो बस्तर में?
जवाब: नहीं भैया हम बस्तर में कोई हिंसा नहीं चाहते, हम पहले जैसा बस्तर चाहते हैं पर हम माओवादी के ख़िलाफ़ नहीं बोल सकते. हम माओवादी के ख़िलाफ़ बोलेंगे तो वो हमारा गला ही काट देंगे.
सवाल: हाँ, आज दिनभर आप लोगों ने सरकार क्या क्या ग़लत कर रही है उसका तो खूब विस्तार से बयान किया और सरकार खूब बुरा कर रही है और हम उसके विरोध में आपके साथ हैं और उसकी भर्त्सना करते हैं पर आप लोग माओवादी के अत्याचार के ख़िलाफ़ तो एक शब्द भी नहीं बोले, वे भी तो लगभग रोज़ आदिवासी को मुखबिर बोल कर मार रहे हैं. और सरकार जो ग़लत कर रही है हत्या और बलात्कार वह भी तो ज़्यादातर आपके आदिवासी युवा ही कर रहे हैं जो पहले कभी नक्सली थे और सरकार उन पर लगाम नहीं लगा रही है.
जवाब: जी आप सही कह रहे हैं. हम दोनों तरफ़ से फंस गए हैं. अभी तो आदिवासी ही मारता है और आदिवासी ही मरता है दोनों तरफ़ से. अब तो पुलिस में भी ज़्यादातर आदिवासी ही मर रहे हैं नक्सलियों में तो हमेशा से ही सिर्फ़ आदिवासी ही मरते हैं.
सवाल: और आप लोग यहां बड़ी कंपनी का भी विरोध कर रहे थे. पर नक्सली तो हर बड़ी कंपनी से पैसा लेकर उनका काम चलने देते हैं. पहले सुकमा से एस्सार का विशाखापट्टनम तक आयरन ओर ले जाने के लिए पाइपलाइन बना पूरे माओवादी इलाक़े से और माओवादी उनसे पैसा लेते थे. अभी सुन रहे हैं वो आमदई में भी माइंस चलाने के लिए कंपनी से 30 करोड़ यह कह कर लिए हैं कि वे बीच-बीच में कुछ लोगों को मारेंगे पर माइंस का काम चलने देंगे. कुछ बड़े मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ये डील कराई है.
जवाब: हमने भी ये सब सुना है. आमदई इलाक़े के गांव के लोग ये सब बताते हैं पर हम ये सब चर्चा नहीं कर सकते. फिर हमारे ही साथी बड़े माओवादी नेताओं को चुग़ली कर देते हैं.
सवाल: आप लोग अपने आंदोलन में पांचवी अनुसूची की मांग कर रहे हो कि सरकार को सड़क बनाने और कैम्प लगाने के लिए ग्राम सभा की अनुमति लेनी चाहिए. आप लोग बिलकुल सही कर रहे हो हम आपके इस मांग के समर्थक हैं. पर ये बताओ आप बस्तर में शांति चाहते हो कि नहीं? अगर चाहते हो तो जो भी बुरा कर रहे हैं सभी लोगों को बोलना पड़ेगा ना? ताली दो हाथ से बजती है. सिर्फ़ एक की बुराई करने से तो कोई आपको गंभीरता से नहीं लेगा. माओवादी जो आपके इलाकों में कैम्प लगाकर 40 साल से बैठे हैं उन्होंने वो कैम्प आपकी ग्राम सभाओं से अनुमति लेकर लगाए हैं क्या? यदि नहीं तो सरकार को ज़रूर बोलिए पर साथ में माओवादियों को भी बोलिए कि वे सभी काम ग्राम सभा की अनुमति से ही करें.
जवाब: हम बस्तर में शांति चाहते हैं पर हम ये सब माओवादियों को नहीं बोल सकते. हम ये भी समझते हैं कि माओवादी सड़क और पुल का इसलिए हमसे विरोध करवाते हैं क्योंकि उससे पुलिस उधर आ जाएगी. माओवादी अपना अस्तित्व बचाने के लिए हमारा उपयोग कर रहे हैं, पर हम यह भी नहीं चाहते कि हमारे इलाक़े में माइनिंग हो. बड़ी कंपनी हमारे इलाक़े में आए हम यह भी नहीं चाहते.
सवाल: हम आपकी मांग का समर्थन करते हैं. देश के संविधान के अनुसार पांचवी अनुसूची इलाक़े में ग्राम सभा की सहमति किसी भी काम में लिए ज़रूरी है. सरकार इन नियमों का पालन नहीं कर रही है, यह ग़लत है और इसका विरोध होना चाहिए. पर क्या आप जानते हो कि माओवादी आपके साथ जो प्रयोग कर रहे हैं उससे उनकी भाषा में संयुक्त मोर्चा का प्रयोग कहते हैं?
जवाब: नहीं, प्लीज़ बताइए.
सवाल: माओवाद के दो सिद्धांत हैं. पहला लंबा जनयुद्ध जिसमें वे बंदूक़ की मदद से राजनीतिक सत्ता हासिल करना चाहते हैं और जब वह सम्भव नहीं दिखता तब वे बड़े बदलाव के लिए संयुक्त मोर्चा का भी प्रयोग करते हैं, जैसा उन्होंने नेपाल में किया था और उस रास्ते से वहां शांति आई थी. आप लोगों के साथ मिलकर वे मध्य भारत में भी संयुक्त मोर्चा का प्रयोग कर रहे हैं और इस रास्ते से शांति आ सकती है पर इसके लिए आप लोगों को थोड़ा उन पर दबाव बनाना पड़ेगा.
जवाब: क्या दबाव बनाना पड़ेगा?
सवाल: नेपाल में जब माओवादियों को समझ में आया कि वे चीन की तरह सत्ता में क़ब्ज़ा नहीं कर सकेंगे तब संयुक्त मोर्चा के प्रयोग में उन्होंने धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र जैसी मांगें रखीं और उसके बदले में हिंसा छोड़ देने की बात कही. यहां नक्सली जल, जंगल और ज़मीन का सही मुद्दा आप लोगों की मदद से उठा रहे हैं, अगर वे इसके बदले में हिंसा छोड़ने की बात कहें तो हो सकता है सरकार मान भी जाए. यह माओवादियों की बड़ी जीत और एक बहुत बड़ा योगदान होगा. पिछले 75 सालों में कोई भी पार्टी संविधान में लिखे जल जंगल और ज़मीन से जुड़े इन आदिवासी हितैषी क़ानूनों को सही रूप से लागू नहीं कर पाई है, जिसे माओवादी बातचीत के बाद लागू करवा सकते हैं. पर इसके लिए आप लोगों को माओवादियों पर दबाव बनाना पड़ेगा. अभी आप सिर्फ़ माओवादी के हित के लिए काम कर रहे हैं पर आप तो दर असल आपके समाज के भले के लिए यह काम कर रहे हैं न?
जवाब: जी भैया. हम चाहते हैं कि बस्तर में शांति हो और हमें संविधान में लिखें सभी अधिकार भी मिलें. ये जंगल हमारा है. हम जंगल को बचाना चाहते हैं. हम बस्तर में पहले जैसा रहना चाहते हैं.
सवाल: तो इसके लिए हमें साथ काम करना पड़ेगा.
जवाब: यह बहुत ख़तरनाक है. नक्सली आपको सरकारी और पुलिस का एजेंट बोलते हैं जबकि हम जानते हैं कि आप सही बोल रहे हैं पर हम ये सब नहीं बोल सकते.
सवाल: चलिए कोई तरीक़ा निकालने का प्रयास करते हैं. आप भी सोचिए. मैं भी सोचता हूं. शुभ यात्रा.
(शुभ्रांशु चौधरी देश के जाने-माने पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं. उससे दलित खबर का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)


